चलिए आज विचार करते हैं कि शिक्षा का माध्यम क्या होना चाहिए जो छात्रहित में लाभप्रद रहे |
जहाँ तक निजी समझ है उस अनुसार मोटे तौर पर अध्यापन के निम्न अवयव है
- एक विषय (जिसे समझाना है) |
- माध्यम या भाषा जिससे वह विषय छात्र को समझाया जाये |
- अध्यापक
- छात्र
इनमें विषय ,छात्र व अध्यापक पूर्व निर्धारित हैं, अब बात आती है माध्यम या भाषा जिससे विषय को छात्र को संप्रेषित करना है | मोटे तौर पर सम्प्रेषण छात्र व अध्यापक के मध्य किसी प्रकरण को समझाने का एक जरिया है | प्रभावी सम्प्रेषण वह है जिसमे वक्ता जो बताना चाह रहा है उसे श्रोता ठीक उसी तरह समझ सकें , यहां बात आती है माध्यम या भाषा की, अगर छात्र व अध्यापक का माध्यम एक ही है हो सम्प्रेषण प्रभावी होगा | अगर इनमे से किसी एक का भी माध्यम अलग है तो बात बिगड़ जायेगी | हाँ हिंदी भाषी स्थानों पर कोई और भाषा सिखाना हो तो उस भाषा विशेष हेतु अध्यापक होते हैं ठीक इसी तरह गैर हिंदी भाषी स्थानों के लिए होता है|
शिक्षा का माध्यम क्या हो!!
अब बात आती है शिक्षा का माध्यम क्या हो?? जिससे छात्र को विषय अच्छी तरह से समझ में आ सके!! व्यक्तिगत रूप से राय यह है कि शिक्षा का माध्यम मातृ भाषा ही होना चाहिए | हिंदी भाषी क्षेत्र में हिंदी, कन्नड़ भाषी क्षेत्र में कन्नड़, तमिल भाषी क्षेत्र में तमिल, इसी प्रकार अन्य| हाँ कुछ प्रदेश जैसे गोवा में कोंकड़ी ,पुर्तगाली,हिंदी, कन्नड़ , मराठी आदि में प्रभावी सम्प्रेषण हो सकता है | कुल मिला कर छात्र को विषय की समझ पर ज्यादा जोर होना चाहिए ना कि माध्यम पर | मान लीजिये अगर दिल्ली में रहने वाले किसी छात्र को मलयालम की अच्छी समझ है तो वह छात्र गणित जितना अच्छा मलयालम भाषा से सीख सकेगा उतना अच्छा हिंदी से नहीं। कारण यह है कि पहले तो वह अच्छे से हिंदी भाषा सीखे तब गणित सीख सकेगा | अब उसको अच्छे से पहले से ही पता है कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से पानी बनता है लेकिन अध्यापक उसको जब तक यह नहीं समझा पायेगा कि वेल्लम में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन होता है उसको कुछ समझ नहीं आएगा| (पानी को मलयालम में वेल्लम कहते हैं )। पूरे देश में माध्यम के रूप में आँग्ल भाषा पर लोगों की काफी रूचि है। किसी कस्बे में स्कूल/कॉलेज का नाम, अध्यापक की योग्यता आदि बाद में ; मीडियम पहले देखेंगे। इसे बहुसंख्यक भारतीय मानसिकता कहिये या मातृभाषा की तुलना में विदेशी भाषा का व्यापक प्रसार!! चाहे जो भी हो परन्तु एक बात दिमाग में अवश्य रखिये मातृभाषा की बराबरी कोई भी और भाषा नहीं कर सकती। लोगों का अंग्रेजी माध्यम पर जोर देना व्यर्थ है। साथ ही सरकारों से भी अनुरोध है कि विषय के प्रभावी सम्प्रेषण के दृष्टिगत अनावश्यक गैर मातृभाषा को माध्यम बनाने पर जोर नहीं देना चाहिए।

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